महासागरीय जल की लवणता
(Salinity of The Ocean Water)
सागरीय जल के भार एवं उसमे घुले हुए पदार्थो के भार के अनुपात को सागरीय लवणता कहते है . सामान्य रूप से सागरीय लवणता को प्रति हजार ग्राम जल में स्थित लवण की मात्रा (0%) के रूप में दर्शाया जाता है, जैसे 50% या 50, अथार्त 1000 ग्राम सागरीय जल में 50 ग्राम लवणता की मात्रा है . यह प्रतिशत नहीं अपितु लवणता की मात्रा है .
महासागरो में लवणता का प्रभाव न केवल उसमे रहने वाले जीवों और वनस्पतियों पर ही होता है वरन महासागरों की भौतिक विशेषताएँ, तापक्रम, घनत्व, धाराएँ, दबाव आदि भी उससे प्रभावित होती है . अधिक लवणतायुक्त सागर देर में जमता है . इसी तरह सागर का क्वथनांक या उबाल बिन्दु (Boiling Point) सामान्य जल से ऊँचा रहता है . लवणता अधिक है तो वाष्पीकरण न्यून होता है . सागरीय लवणता के कारण जल का घनत्व भी बढ़ता जाता है . इसी तरह सागर में लहर एवं धारायें, मछली सागरीय जीव, प्लैंकटन आदि लवणता से नियंत्रित होते है .
समुद्री जल विश्लेषण द्वारा सागरों में 27 प्रकार के लवणों का पता लगाया गया, जिनमे से 7 प्रकार के लवण सर्वाधिक महत्वपूर्ण है . ये है -
लवणता के प्रकार | मात्रा % में | |
1. | सोडियम क्लोराइड | 77.8% |
2. | मैग्नेशियम क्लोराइड | 10.9% |
3. | मैग्नेशियम सल्फेट | 4.7% |
4. | कैल्शियम सल्फेट | 3.6% |
5. | पोटैशियम सल्फेट | 2.5% |
6. | कैल्शियम कार्बोनेट | 0.3% |
7. | मैग्नेशियम ब्रोमाइड | 0.2% |
योग | 100% |
सागरीय जल की लवणता के स्रोत
सागरीय लवणता का मुख्य स्रोत पृथ्वी ही है . नदियाँ आदि काल से सागर तक लवण पहुँचाने वाले कारको में सर्वप्रमुख है . पवन तथा ज्वालामुखी से निस्सृत राखों से भी कुछ लवण प्राप्त होता है . महासागरों, सागरों तथा झीलों में लवण की मात्रा को प्रभावित करने वाले कारको को 'नियंत्रक कारक' (Controlling Factors) कहते है . इन कारकों में वाष्पीकरण, वर्षा, नदी के जल के आगमन, पवन, सागरीय धारायें तथा लहरें आदि प्रमुख है .
जहाँ पर तापक्रम ऊँचा रहता है, और वाष्पीकरण अधिक होता है, वहाँ पर लवणता अधिक होती है . जैसे कि कर्क तथा मकर रेखाओं के पास . भूमध्यरेखीय भागों में उच्च तापक्रम तथा अधिक वाष्पीकरण के होते हुए भी अत्याधिक आर्द्रता के कारण लवणता उतनी अधिक नहीं हो पाती है, जितनी की अयनवर्ती भागो में क्योंकि प्रतिदिन अधिक जलवृष्टि के कारण सागरों में जल की वापसी होती रहती है .
ध्रुवो के आसपास कम लवणता की मेखला पायी जाती है . इसी प्रकार नदियों के मुहाने वाले भागों में भी लवणता कम पायी जाती है .
प्रति चक्रवात्तीय दशाएँ, स्थिर पवन, उच्च तापक्रम के साथ लवणता में वृद्धि करती है . अयनवर्ती भागों में उपर्युक्त दशाएँ पायी जाती है . परिणामस्वरूप उच्च लवणता पायी जाती है . व्यापारिक हवाएँ महाद्वीपों के पश्चिमी किनारे (महाद्वीपों के पूर्वी किनारे) से खारे जल को महाद्वीपों के पूर्वी किनारे पर लाकर वहाँ की लवणता बढ़ा देती है . पछुवा हवाएँ महाद्वीपों के पूर्वी तट पर लवणता को कम कर देती है परन्तु पश्चिमी तटों पर बढ़ा देती है .
सागरीय धारायें निश्चय ही लवणता को बढ़ाने तथा घटाने का कार्य करती है . भूमध्यरेखीय गर्म धारायें महाद्वीपों के पश्चिमी भागो से लवण को पूर्वी तटीय भागो में पहुँचा कर वहाँ की लवणता को बढ़ा देती है . मैक्सिको की खाड़ी में इसी कारण से उच्च लवणता पायी जाती है . गल्फस्ट्रीम की गर्म धारा यूरोप के उत्तर पश्चिमी तट पर लवणता को बढ़ा देती है . लेब्राडोर की ठण्डी धारा के कारण उत्तरी अमेरिका के उत्तर पूर्वी तटीय भाग में लवणता घट जाती है .
सागरीय जल की लवणता का वितरण
प्रत्येक महासागर, सागर झील आदि में लवण की मात्रा में अंतर पाया जाता है . लवणता में अन्तर क्षैतिज तथा लम्बवत दोनों रूपों में होता है .
भूमध्यरेखा से ध्रुवों की ओर सामान्य रूप में लवणता की मात्रा में कमी आती है . उच्चतम लवणता उत्तरी गोलार्द्ध में 20 डिग्री से 40 डिग्री अक्षांशो व दक्षिण गोलार्द्ध में 10 डिग्री से 30 डिग्री दक्षिणी अक्षांशो के मध्य पायी जाती है . समस्त उत्तरी गोलार्द्ध में औसत लवणता 34% पायी जाती है . तथा दक्षिणी गोलार्द्ध में 35% रहती है . इस तरह अक्षांशीय वितरण के आधार पर महासागरों में लवणता के चार मण्डल पाये जाते है, जो इस प्रकार है -
1. भूमध्यरेखीय क्षेत्र - कम लवणता वाले मण्डल .
2. अयनवर्ती क्षेत्र - अधिकतम लवणता वाले क्षेत्र
3. शीतोष्ण कटिबंध क्षेत्र - कम लवणता वाले मण्डल
4. ध्रुवीय तथा उपध्रुवीय क्षेत्र - न्यूनतम लवणता वाले मण्डल
उच्च अक्षांशो में गहराई के साथ लवणता बढती जाती है .
मध्य अक्षांशो में 200 फैदम अर्थात 387 मीटर तक लवणता बढती है, परन्तु अधिक गहराई में जानें पर लवणता घटने लगती है .
आइसोहेलाइन - समान लवणता वाले क्षैतिज स्थानों को मिलाने वाली रेखा को आइसोहेलाइन कहते है .
सेलाइन नेक्टर - समुद्री लवणता का मापन सेलाइन नेक्टर से किया जाता है .
महासागरों की औसत लवणता 35% है .
विश्व में सर्वाधिक लवणता तुर्की की वान लेक पायी जाती है, जो 330% है .
विश्व की 3 सर्वाधिक लवण युक्त झीलें इस प्रकार है -
1 वान लेक (तुर्की) - 330% .
2. मृत सागर (Dead Sea) इजराइल एवं जॉर्डन - 238%
3. ग्रेट सॉल्ट लेक (USA) - 220%
समुद्री जल में सर्वाधिक मात्रा में पाये जाने वाला लवण सोडियम क्लोराइड (Nacl) है .
नदियों द्वारा सगरो में निक्षेपित जल तथा अवसाद में कैल्शियम की मात्रा सर्वाधिक (60%) पायी जाती है .
महासागरो की सतह पर सर्वाधिक लवणता अयनवर्ती अक्षांशों में कर्क एवं मकर रेखाओं के समीप पायी जाती है .
महासागरो में अटलांटिक महासागर में सर्वाधिक लवणता 36% पायी जाती है .
हैलोक्लाइन - महासागरीय जल का वह क्षेत्र जहाँ पर लवणता गहराई के साथ तीव्रता से बढती है, हैलोक्लाइन जोन कहलाता है .
काला सागर में लवणता इसलिए कम पायी जाती है क्योंकि काला सागर में डेन्यूब, नीपर, डॉन नदियाँ पर्याप्त मात्रा में जल लाकर विसर्जित करती रहती है .
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